दोहा 27
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥१॥
भावार्थ
अरे रावण! चतुराई ( कपट ) छोड़कर सुन। कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे॥ १ ॥
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥२॥
भावार्थ
हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार ( डींग न हाँक )। श्रीरामजीसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजीके बाण लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे, ॥ २ ॥
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना॥ जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक॥३॥
भावार्थ
और रीछ-वानर तेरे उन गेंदके समान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे, ॥ ३ ॥
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा॥४॥
भावार्थ
तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार ( कृपालु ) श्रीरामजीको भज। अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्निमें घी पड़ गया हो॥ ४ ॥
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि॥२७॥
भावार्थ
[ वह बोला—अरे मूर्ख! ] कुम्भकर्ण-ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड-चेतन जगत्को जीत लिया है!॥ २७ ॥
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