दोहा 118c
पुष्पकविमानपर चढ़कर श्रीसीता-रामजीका अवधके लिये प्रस्थान
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए॥ नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा॥१॥
भावार्थ
भालुओं और वानरोंने कपड़े-गहने पाये और उन्हें पहन-पहनकर वे श्रीरघुनाथजीके पास आये। अनेकों जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति श्रीरामजी बार-बार हँस रहे हैं॥१॥
चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया॥ तुम्हरें बल मैं रावनु मार्यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो॥२॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीने कृपादृष्टिसे देखकर सबपर दया की। फिर वे कोमल वचन बोले—हे भाइयो! तुम्हारे ही बलसे मैंने रावणको मारा और फिर विभीषणका राजतिलक किया॥२॥
निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू॥ सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर॥३॥
भावार्थ
अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ। मेरा स्मरण करते रहना और किसीसे डरना नहीं। ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेममें विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदरपूर्वक बोले— ॥३॥
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरें होत बचन सुनि मोहा॥ दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा॥४॥
भावार्थ
प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है। पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है। हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकोंके ईश्वर हैं। हम वानरोंको दीन जानकर ही आपने सनाथ (कृतार्थ) किया है॥४॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं॥ देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा॥५॥
भावार्थ
प्रभुके (ऐसे) वचन सुनकर हम लाजके मारे मरे जा रहे हैं। कहीं मच्छर भी गरुड़का हित कर सकते हैं? श्रीरामजीका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें मग्न हो गये। उनकी घर जानेकी इच्छा नहीं है॥५॥
प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि। हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥११८(क)॥
भावार्थ
परन्तु प्रभुकी प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्रीरामजीके रूपको हृदयमें रखकर और अनेकों प्रकारसे विनती करके हर्ष और विषादसहित घरको चले॥११८(क)॥
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान। सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान॥११८(ख)॥
भावार्थ
वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषणसहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं,॥११८(ख)॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि। सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥११८(ग)॥
भावार्थ
वे कुछ कह नहीं सकते; प्रेमवश नेत्रोंमें जल भर-भरकर, नेत्रोंका पलक मारना छोड़कर (टकटकी लगाये) सम्मुख होकर श्रीरामजीकी ओर देख रहे हैं॥११८(ग)॥
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