दोहा 1
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥ प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥ १ ॥
भावार्थ
फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करनेमें कितनी देर लगेगी ? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमान्जीने कहा—प्रभुका प्रताप भारी बड़वानल ( समुद्रकी आग ) के समान है। इसने पहले समुद्रके जलको सोख लिया था॥ १ ॥
तव रिपु नारि रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा॥ सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी॥ २ ॥
भावार्थ
परन्तु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे खारा भी हो गया। हनुमान्जीकी यह अत्युक्ति ( अलङ्कारपूर्ण युक्ति ) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये॥ २ ॥
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥ राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥ ३ ॥
भावार्थ
जाम्बवान्ने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [ और कहा— ] मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [ रामप्रतापसे ] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा॥ ३ ॥
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥ राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥ ४ ॥
भावार्थ
फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [ और कहा— ] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये। अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण-कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये॥ ४ ॥
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥ सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥ ५ ॥
भावार्थ
विकट वानरोंके समूह ( आप ) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये। यह सुनकर वानर और भालू हूह ( हुंकार ) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रतापसमूहकी [ अथवा प्रतापके पुंज श्रीरामजीकी ] जय पुकारते हुए चले॥ ५ ॥
अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १ ॥
भावार्थ
बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [ उखाड़कर ] उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नीलको देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [ सुन्दर ] सेतु बनाते हैं॥ १ ॥
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