दोहा 8
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥ भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥१॥
भावार्थ
ऐसा कहकर वह महान् अभिमानी बालि सुग्रीवको तिनकेके समान जानकर चला। दोनों भिड़ गये। बालिने सुग्रीवको बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोरसे गरजा॥ १ ॥
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥ मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥२॥
भावार्थ
तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा। घूँसेकी चोट उसे वज्रके समान लगी। [ सुग्रीवने आकर कहा— ] हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है॥ २ ॥
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥ कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥३॥
भावार्थ
[ श्रीरामजीने कहा— ] तुम दोनों भाइयोंका एक-सा ही रूप है। इसी भ्रमसे मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीरामजीने सुग्रीवके शरीरको हाथसे स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्रके समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही॥ ३ ॥
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥ पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥४॥
भावार्थ
तब श्रीरामजीने सुग्रीवके गलेमें फूलोंकी माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनोंमें पुनः अनेक प्रकारसे युद्ध हुआ। श्रीरघुनाथजी वृक्षकी आड़से देख रहे थे॥ ४ ॥
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥८॥
भावार्थ
सुग्रीवने बहुत-से छल-बल किये, किन्तु [ अन्तमें ] भय मानकर हृदयसे हार गया। तब श्रीरामजीने तानकर बालिके हृदयमें बाण मारा॥ ८ ॥
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