दोहा 28
समुद्र लाँघनेका परामर्श, जाम्बवन्तका हनुमान्जीको बल याद दिलाकर उत्साहित करना
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा॥ हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई॥१॥
भावार्थ
समुद्रके तीरपर छोटे भाई जटायुकी क्रिया ( श्राद्ध आदि ) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा—हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानीमें एक बार आकाशमें उड़कर सूर्यके निकट चले गये॥ १ ॥
तेज न सहि सक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा॥ जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा॥२॥
भावार्थ
वह ( जटायु ) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। ( किन्तु ) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्यके पास चला गया। अत्यन्त अपार तेजसे मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोरसे चीख मारकर जमीनपर गिर पड़ा॥ २ ॥
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही॥ बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा। देह जनित अभिमान छड़ावा॥३॥
भावार्थ
वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित ( देहसम्बन्धी ) अभिमानको छुड़ा दिया॥ ३ ॥
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही॥ तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता॥४॥
भावार्थ
[ उन्होंने कहा— ] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा। उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा॥ ४ ॥
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता॥ मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥५॥
भावार्थ
और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजीको दिखा देना। मुनिकी वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभुका कार्य करो॥ ५ ॥
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका॥ तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई॥६॥
भावार्थ
त्रिकूट पर्वतपर लङ्का बसी हुई है। वहाँ स्वभावहीसे निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नामका उपवन ( बगीचा ) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [ इस समय भी ] वे सोचमें मग्न बैठी हैं॥ ६ ॥
मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार। बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार॥२८॥
भावार्थ
मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीधकी दृष्टि अपार होती है ( बहुत दूरतक जाती है )। क्या करूँ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता॥ २८ ॥
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