दोहा 12
वर्षा-ऋतु-वर्णन
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥ सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥१॥
भावार्थ
हे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं॥१॥
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती॥ सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ॥२॥
भावार्थ
जो सुग्रीव दिन-रात बालिके भयसे व्याकुल रहता था, जिसके शरीरमें बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ताके मारे जला करती थी, उसी सुग्रीवको उन्होंने वानरोंका राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है॥२॥
जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं॥ पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई॥३॥
भावार्थ
जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्तिके जालमें फँसें? फिर श्रीरामजीने सुग्रीवको बुला लिया और बहुत प्रकारसे उन्हें राजनीतिकी शिक्षा दी॥३॥
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा॥ गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई॥४॥
भावार्थ
फिर प्रभुने कहा—हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्षतक गाँव ( बस्ती ) में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म-ऋतु बीतकर वर्षा-ऋतु आ गयी। अतः मैं यहाँ पास ही पर्वतपर टिक रहूँगा॥४॥
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयँ धरेहु मम काजू॥ जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए॥५॥
भावार्थ
तुम अंगदसहित राज्य करो। मेरे कामका हृदयमें सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वतपर जा टिके॥५॥
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ॥१२॥
भावार्थ
देवताओंने पहलेसे ही उस पर्वतकी एक गुफाको सुन्दर बना ( सजा ) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपाकी खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे॥१२॥
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