दोहा 47
जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥ जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥१॥
भावार्थ
हे नाथ! जिस प्रकारसे मेरा यह भारी भ्रम मिट जाय, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इसपर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको तुम जानते हो॥ १ ॥
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥ चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥२॥
भावार्थ
तुम मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके भक्त हो। तुम्हारी चतुराईको मैं जान गया। तुम श्रीरामजीके रहस्यमय गुणोंको सुनना चाहते हो; इसीसे तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो॥ २ ॥
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥ महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥३॥
भावार्थ
हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजीकी सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्रीरामजीकी कथा [ उसे नष्ट कर देनेवाली ] भयंकर कालीजी हैं॥ ३ ॥
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥४॥
भावार्थ
श्रीरामजीकी कथा चन्द्रमाकी किरणोंके समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही सन्देह पार्वतीजीने किया था, तब महादेवजीने विस्तारसे उसका उत्तर दिया था॥ ४ ॥
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥४७॥
भावार्थ
अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वही उमा और शिवजीका संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतुसे हुआ, उसे हे मुनि! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा॥ ४७ ॥
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