दोहा 46
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥ राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥१॥
भावार्थ
यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये। संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है॥ १ ॥
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥२॥
भावार्थ
कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं। संसारमें चार जातिके जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं॥ २ ॥
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥३॥
भावार्थ
हे मुनिराज! वह भी राम [ नाम ] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [ काशीमें मरनेवाले जीवको ] रामनामका ही उपदेश करते हैं [ इसीसे उनको परमपद मिलता है ]। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये॥ ३ ॥
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥ नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥४॥
भावार्थ
एक राम तो अवधनरेश दशरथजीके कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्रीके विरहमें अपार दुःख उठाया और क्रोध आनेपर युद्धमें रावणको मार डाला॥ ४ ॥
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥४६॥
भावार्थ
हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्यके धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये॥ ४६ ॥
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