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दोहा 341

चौ०

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥ सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥१॥

भावार्थ

जनकजीने मुनिमण्डलीको सिर नवाया और सभीसे आशीर्वाद पाया। फिर आदरके साथ वे रूप, शील और गुणोंके निधान सब भाइयोंसे—अपने दामादोंसे मिले;॥ १ ॥

चौ०

जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥ राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥२॥

भावार्थ

और सुन्दर कमलके समान हाथोंको जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेमसे ही जन्मे हों। हे रामजी! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ! आप मुनियों और महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस हैं॥ २ ॥

चौ०

करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥ ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥३॥

भावार्थ

योगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मदको त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणोंकी राशि हैं,॥ ३ ॥

चौ०

मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥ महिमा निगमु नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई ॥ ४ ॥

भावार्थ

जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद ‘नेति’ कहकर वर्णन करता है और जो [ सच्चिदानन्द ] तीनों कालोंमें एकरस ( सर्वदा और सर्वथा निर्विकार ) रहते हैं;॥ ४ ॥

दो०

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥३४१॥

भावार्थ

वे ही समस्त सुखोंके मूल [ आप ] मेरे नेत्रोंके विषय हुए। ईश्वरके अनुकूल होनेपर जगत्‌में जीवको सब लाभ-ही-लाभ है॥ ३४१ ॥

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