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दोहा 340

चौ०

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥ भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥१॥

भावार्थ

राजा दशरथजीने विनती करके प्रतिष्ठित जनोंको लौटाया और आदरके साथ सब मंगनोंको बुलवाया। उनको गहने-कपड़े, घोड़े-हाथी दिये और प्रेमसे पुष्ट करके सबको सम्पन्न अर्थात्‌ बलयुक्त कर दिया॥ १ ॥

चौ०

बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥ बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं॥२॥

भावार्थ

वे सब बारंबार विरुदावली ( कुलकीर्ति ) बखानकर और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर लौटे। कोसलाधीश दशरथजी बार-बार लौटनेको कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते॥ २ ॥

चौ०

पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥ राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥३॥

भावार्थ

दशरथजीने फिर सुहावने वचन कहे—हे राजन्‌! बहुत दूर आ गये, अब लौटिये। फिर राजा दशरथजी रथसे उतरकर खड़े हो गये। उनके नेत्रोंमें प्रेमका प्रवाह बढ़ आया ( प्रेमाश्रुओंकी धारा बह चली )॥ ३ ॥

चौ०

तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥ करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥४॥

भावार्थ

तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेहरूपी अमृतमें डुबोकर वचन बोले—मैं किस तरह बनाकर ( किन शब्दोंमें ) विनती करूँ। हे महाराज! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है॥ ४ ॥

दो०

कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥३४०॥

भावार्थ

अयोध्यानाथ दशरथजीने अपने स्वजन समधीका सब प्रकारसे सम्मान किया। उनके आपसके मिलनेमें अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदयमें समाती न थी॥ ३४० ॥

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