दोहा 296
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥ समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए॥१॥
भावार्थ
यों कहते हुए वे अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्र पहन-पहनकर चले। आनन्दित होकर नगाड़ेवालोंने बड़े जोरसे नगाड़ोंपर चोट लगायी। सब लोगोंने जब यह समाचार पाया, तब घर-घर बधावे होने लगे॥१॥
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू॥ सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे॥२॥
भावार्थ
चौदहों लोकोंमें उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्रीरघुनाथजीका विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गये और रास्ते, घर तथा गलियाँ सजाने लगे॥२॥
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि॥ तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई॥३॥
भावार्थ
यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजीकी मङ्गलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर-प्रीति होनेसे वह सुन्दर मङ्गलरचनासे सजायी गयी॥३॥
ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम बिचित्र बजारू॥ कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥४॥
भावार्थ
ध्वजा, पताका, परदे और सुन्दर चँवरोंसे सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है। सोनेके कलश, तोरण, मणियोंकी झालरें, हलदी, दूब, दही, अक्षत और मालाओंसे— ॥४॥
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ। बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥२९६॥
भावार्थ
लोगोंने अपने-अपने घरोंको सजाकर मङ्गलमय बना लिया। गलियोंको चतुरसमसे सींचा और [ द्वारोंपर ] सुन्दर चौक पुराये। [ चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूरसे बने हुए एक सुगन्धित द्रवको चतुरसम कहते हैं ]॥२९६॥
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