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दोहा 295

चौ०

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई॥ सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं॥१॥

भावार्थ

राजाने सारे रनिवासको बुलाकर जनकजीकी पत्रिका बाँचकर सुनायी। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्षसे भर गयीं। राजाने फिर दूसरी सब बातोंका ( जो दूतोंके मुखसे सुनी थीं ) वर्णन किया॥१॥

चौ०

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी॥ मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारीं॥२॥

भावार्थ

प्रेममें प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलोंकी गरज सुनकर प्रफुल्लित होती हैं। बड़ी-बूढ़ी [ अथवा गुरुओंकी ] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्दमें मग्न हैं॥२॥

चौ०

लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥ राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥३॥

भावार्थ

उस अत्यन्त प्रिय पत्रिकाको आपसमें लेकर सब हृदयसे लगाकर छाती शीतल करती हैं। राजाओंमें श्रेष्ठ दशरथजीने श्रीराम-लक्ष्मणकी कीर्ति और करनीका बारंबार वर्णन किया॥३॥

चौ०

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए॥ दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता॥४॥

भावार्थ

‘यह सब मुनिकी कृपा है’ ऐसा कहकर वे बाहर चले आये। तब रानियोंने ब्राह्मणोंको बुलाया और आनन्दसहित उन्हें दान दिये। श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले॥४॥

सो०

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥ २९५॥

भावार्थ

फिर भिक्षुकोंको बुलाकर करोड़ों प्रकारकी निछावरें उनको दीं। ‘चक्रवर्ती महाराज दशरथके चारों पुत्र चिरंजीवी हों’॥२९५॥

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