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दोहा 291

चौ०

सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता॥ प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी॥१॥

भावार्थ

चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गये। स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीरमें समाता नहीं। भरतजीका पवित्र प्रेम देखकर सारी सभाने विशेष सुख पाया॥ १ ॥

चौ०

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥ भैआ कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥२॥

भावार्थ

तब राजा दूतोंको पास बैठाकर मनको हरनेवाले मीठे वचन बोले—भैया! कहो, दोनों बच्चे कुशलसे तो हैं ? तुमने अपनी आँखोंसे उन्हें अच्छी तरह देखा है न ?॥ २ ॥

चौ०

स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥ पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥३॥

भावार्थ

साँवले और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, विश्वामित्र मुनिके साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेमके विशेष वश होनेसे बार-बार इस प्रकार कह ( पूछ ) रहे हैं॥ ३ ॥

चौ०

जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥ कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने॥४॥

भावार्थ

[ भैया! ] जिस दिनसे मुनि उन्हें लिवा ले गये, तबसे आज ही हमने सच्ची खबर पायी है। कहो तो महाराज जनकने उन्हें कैसे पहचाना ? ये प्रिय ( प्रेमभरे ) वचन सुनकर दूत मुसकराये॥ ४ ॥

दो०

सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ। रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥२९१॥

भावार्थ

[ दूतोंने कहा— ] हे राजाओंके मुकुटमणि! सुनिये, आपके समान धन्य और कोई नहीं है, जिनके राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्वके विभूषण हैं॥२९१॥

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