दोहा 290
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन॥ भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई॥१॥
भावार्थ
जनकजीके दूत श्रीरामचन्द्रजीकी पवित्र पुरी अयोध्यामें पहुँचे। सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वारपर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजीने सुनकर उन्हें बुला लिया॥ १ ॥
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥ बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥२॥
भावार्थ
दूतोंने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजाने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रोंमें जल ( प्रेम और आनन्दके आँसू ) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी॥ २ ॥
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी॥ पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची॥३॥
भावार्थ
हृदयमें राम और लक्ष्मण हैं, हाथमें सुन्दर चिट्ठी है, राजा उसे हाथमें लिये ही रह गये, खट्टी-मीठी कुछ भी कह न सके। फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्रिका पढ़ी। सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी॥ ३ ॥
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई॥ पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई॥ ४॥
भावार्थ
भरतजी अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्नके साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गये। बहुत प्रेमसे सकुचाते हुए पूछते हैं—पिताजी! चिट्ठी कहाँसे आयी है ?॥ ४ ॥
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥२९०॥
भावार्थ
हमारे प्राणोंसे प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देशमें हैं ? स्नेहसे सने ये वचन सुनकर राजाने फिरसे चिट्ठी पढ़ी॥ २९० ॥
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