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दोहा 288

चौ०

बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परइ सपरन सुहाई॥ १॥

भावार्थ

बाँस सब हरी-हरी मणियों ( पन्ने ) के सीधे और गाँठोंसे युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [ कि मणियोंके हैं या साधारण ]। सोनेकी सुन्दर नागबेलि ( पानकी लता ) बनायी, जो पत्तोंसहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी॥ १ ॥

चौ०

तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए॥ मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा॥२॥

भावार्थ

उसी नागबेलिके रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन ( बाँधनेकी रस्सी ) बनाये। बीच-बीचमें मोतियोंकी सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नोंको चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [ लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंगके ] कमल बनाये॥ २ ॥

चौ०

किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥ सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ीं॥३॥

भावार्थ

भौंरे और बहुत रंगोंके पक्षी बनाये, जो हवाके सहारे गूँजते और कूजते थे। खंभोंपर देवताओंकी मूर्तियाँ गढ़कर निकालीं, जो सब मङ्गलद्रव्य लिये खड़ी थीं॥ ३ ॥

चौ०

चौकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाईं॥४॥

भावार्थ

गजमुक्ताओंके सहज ही सुहावने अनेकों तरहके चौक पुराये॥ ४ ॥

दो०

सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि। हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥२८८॥

भावार्थ

नीलमणिको कोरकर अत्यन्त सुन्दर आमके पत्ते बनाये। सोनेके बौर ( आमके फूल ) और रेशमकी डोरीसे बँधे हुए पन्नेके बने फलोंके गुच्छे सुशोभित हैं॥ २८८ ॥

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