दोहा 287
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई॥ मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥१॥
भावार्थ
जाकर अयोध्याको दूत भेजो, जो राजा दशरथको बुला लावें। राजाने प्रसन्न होकर कहा—हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतोंको बुलाकर भेज दिया॥ १ ॥
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥ हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा॥२॥
भावार्थ
फिर सब महाजनोंको बुलाया और सबने आकर राजाको आदरपूर्वक सिर नवाया। [ राजाने कहा— ] बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगरको चारों ओरसे सजाओ॥ २ ॥
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई॥३॥
भावार्थ
महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने-अपने घर आये। फिर राजाने नौकरोंको बुला भेजा [ और उन्हें आज्ञा दी कि ] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वे सब राजाके वचन सिरपर धरकर और सुख पाकर चले॥ ३ ॥
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥ बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥४॥
भावार्थ
उन्होंने अनेक कारीगरोंको बुला भेजा, जो मण्डप बनानेमें कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्माकी वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [ पहले ] सोनेके केलेके खंभे बनाये॥ ४ ॥
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥२८७॥
भावार्थ
हरी-हरी मणियों ( पन्ने ) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों ( माणिक ) के फूल बनाये। मण्डपकी अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्माका मन भी भूल गया॥ २८७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें