दोहा 250
राजाओंसे धनुष न उठना, जनककी निराशाजनक वाणी · श्रीलक्ष्मणजीका क्रोध
नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥ रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥१॥
भावार्थ
राजाओंकी भुजाओंका बल चन्द्रमा है, शिवजीका धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुषको देखकर गौंसे ( चुपके-से ) चलते बने ( उसे उठाना तो दूर रहा, छूनेतककी हिम्मत न हुई )॥ १ ॥
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा॥ त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही॥२॥
भावार्थ
उसी शिवजीके कठोर धनुषको आज इस राजसमाजमें जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकोंकी विजयके साथ ही उसको जानकीजी बिना किसी विचारके हठपूर्वक वरण करेंगी॥ २ ॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे॥ परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥३॥
भावार्थ
प्रण सुनकर सब राजा ललचा उठे। जो वीरताके अभिमानी थे, वे मनमें बहुत ही तमतमाये। कमर कसकर अकुलाकर उठे और अपने इष्टदेवोंको सिर नवाकर चले॥ ३ ॥
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥ जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥४॥
भावार्थ
वे तमककर ( बड़े तावसे ) शिवजीके धनुषकी ओर देखते हैं और फिर निगाह जमाकर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों भाँतिसे जोर लगाते हैं, पर वह उठता ही नहीं। जिन राजाओंके मनमें कुछ विवेक है, वे धनुषके पास ही नहीं जाते॥ ४ ॥
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥२५०॥
भावार्थ
वे मूर्ख राजा तमककर ( किटकिटाकर ) धनुषको पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तो लजाकर चले जाते हैं, मानो वीरोंकी भुजाओंका बल पाकर वह धनुष अधिक-अधिक भारी होता जाता है॥ २५० ॥
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