दोहा 249
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥ सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥१॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका रूप और सीताजीकी छबि देखकर स्त्री-पुरुषोंने पलक मारना छोड़ दिया ( सब एकटक उन्हींको देखने लगे )। सभी अपने मनमें सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं। मन-ही-मन वे विधातासे विनय करते हैं— ॥ १ ॥
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥ बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू। सीय राम कर करै बिबाहू॥२॥
भावार्थ
हे विधाता! जनककी मूढ़ताको शीघ्र हर लीजिये और हमारी ही ऐसी सुन्दर बुद्धि उन्हें दीजिये कि जिससे बिना ही विचार किये राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजीका विवाह रामजीसे कर दें॥ २ ॥
जगु भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू॥ एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू॥३॥
भावार्थ
संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसीको अच्छी लगती है। हठ करनेसे अन्तमें भी हृदय जलेगा। सब लोग इसी लालसामें मग्न हो रहे हैं कि जानकीजीके योग्य वर तो यह साँवला ही है॥ ३ ॥
तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥ कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥४॥
भावार्थ
तब राजा जनकने बंदीजनों ( भाटों ) को बुलाया। वे विरुदावली ( वंशकी कीर्ति ) गाते हुए चले आये। राजाने कहा—जाकर मेरा प्रण सबसे कहो। भाट चले, उनके हृदयमें कम आनन्द न था॥ ४ ॥
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल॥२४९॥
भावार्थ
भाटोंने श्रेष्ठ वचन कहा— हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले सब राजागण! सुनिये। हम अपनी भुजा उठाकर जनकजीका विशाल प्रण कहते हैं॥ २४९ ॥
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