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दोहा 244

चौ०

कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥ पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥१॥

भावार्थ

कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [ दाहिने ] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) सुशोभित हैं। नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान्‌ शोभा छायी हुई है॥ १ ॥

चौ०

देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥ हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥२॥

भावार्थ

उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए। नेत्र एकटक ( निमेषशून्य ) हैं और तारे ( पुतलियाँ ) भी नहीं चलते। जनकजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए। तब उन्होंने जाकर मुनिके चरणकमल पकड़ लिये॥ २ ॥

चौ०

करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥ जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥३॥

भावार्थ

विनती करके अपनी कथा सुनायी और मुनिको सारी रंगभूमि ( यज्ञशाला ) दिखलायी। [ मुनिके साथ ] दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं॥ ३ ॥

चौ०

निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥ भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥४॥

भावार्थ

सबने रामजीको अपनी-अपनी ओर ही मुख किये हुए देखा; परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। मुनिने राजासे कहा—रंगभूमिकी रचना बड़ी सुन्दर है। [ विश्वामित्र-जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनिसे रचनाकी प्रशंसा सुनकर ] राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला॥ ४ ॥

दो०

सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥२४४॥

भावार्थ

सब मञ्चोंसे एक मञ्च अधिक सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल था। [ स्वयं ] राजाने मुनिसहित दोनों भाइयोंको उसपर बैठाया॥ २४४ ॥

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