दोहा 243
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥ सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥१॥
भावार्थ
दोनों मूर्तियाँ स्वभावसे ही ( बिना किसी बनाव-शृंगारके ) मनको हरनेवाली हैं। करोड़ों कामदेवोंकी उपमा भी उनके लिये तुच्छ है। उनके सुन्दर मुख शरद् [ पूर्णिमा ] के चन्द्रमाकी भी निन्दा करनेवाले ( उसे नीचा दिखानेवाले ) हैं और कमलके समान नेत्र मनको बहुत ही भाते हैं॥ १ ॥
चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥२॥
भावार्थ
सुन्दर चितवन [ सारे संसारके मनको हरनेवाले ] कामदेवके भी मनको हरनेवाली है। वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चञ्चल ( झूमते हुए ) कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर ( ओठ ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है॥ २ ॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥३॥
भावार्थ
हँसी चन्द्रमाकी किरणोंका तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ ऊँचे ] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं ( दीप्तिमान् हो रहे हैं )। [ काले घुँघराले ] बालोंको देखकर भौंरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं॥ ३ ॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥ रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥४॥
भावार्थ
पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी ( काढ़ी ) हुई हैं। शङ्खके समान सुन्दर ( गोल ) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [ को बता रही ] हैं॥ ४ ॥
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥२४३॥
भावार्थ
हृदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कण्ठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ ऊँचे तथा पुष्ट ] हैं, ऐंड़ ( खड़े होनेकी शान ) सिंहकी-सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं॥ २४३ ॥
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