दोहा 222
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥ जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥१॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर कोई एक ( दूसरी सखी ) कहने लगी—यह वर जानकीके योग्य है। हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हींसे विवाह कर देगा॥१॥
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥ सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥२॥
भावार्थ
किसीने कहा—राजाने इन्हें पहचान लिया है और मुनिके सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है। परन्तु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता। वह होनहारके वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेकका ही आश्रय लिये हुए है ( प्रणपर अड़े रहनेकी मूर्खता नहीं छोड़ता )॥२॥
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता॥ तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥३॥
भावार्थ
कोई कहती है—यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीजीको यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है॥३॥
जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥ सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥४॥
भावार्थ
जो दैवयोगसे ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायँ। हे सखी! मेरे तो इसीसे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आवेंगे॥४॥
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥२२२॥
भावार्थ
नहीं तो ( विवाह न हुआ तो ) हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी हो सकता है जब हमारे पूर्वजन्मोंके बहुत पुण्य हों॥२२२॥
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