दोहा 221
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥ कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥१॥
भावार्थ
हे सखी! [ भला ] कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा जो इस रूपको देखकर मोहित न हो जाय ( अर्थात् यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करनेवाला है )। [ तब ] कोई दूसरी सखी प्रेमसहित कोमल वाणीसे बोली—हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो— ॥१॥
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥ मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥२॥
भावार्थ
ये दोनों [ राजकुमार ] महाराज दशरथजीके पुत्र हैं। बाल राजहंसोंका-सा सुन्दर जोड़ा है। ये मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं, इन्होंने युद्धके मैदानमें राक्षसोंको मारा है॥२॥
स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥ कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥३॥
भावार्थ
जिनका श्याम शरीर और सुन्दर कमल-जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहुके मदको चूर करनेवाले और सुखकी खान हैं और जो हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं, वे कौसल्याजीके पुत्र हैं; इनका नाम राम है॥३॥
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥ लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥४॥
भावार्थ
जिनका रंग गोरा और किशोर अवस्था है और जो सुन्दर वेष बनाये और हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीरामजीके पीछे-पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं; उनका नाम लक्ष्मण है। हे सखी! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं॥४॥
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि। आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥२२१॥
भावार्थ
दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्रका काम करके और रास्तेमें मुनि गौतमकी स्त्री अहल्याका उद्धार करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आये हैं। यह सुनकर सब स्त्रियाँ प्रसन्न हुईं॥२२१॥
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