दोहा 209
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥१॥
भावार्थ
भगवान्के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमालके वृक्षकी तरह श्याम शरीर है, कमरमें पीताम्बर [ पहने ] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथोंमें [ क्रमशः ] सुन्दर धनुष और बाण हैं॥१॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना॥२॥
भावार्थ
श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजीको महान् निधि प्राप्त हो गयी। [ वे सोचने लगे— ] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव ( ब्राह्मणोंके भक्त ) हैं। मेरे लिये भगवान्ने अपने पिताको भी छोड़ दिया॥२॥
चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥ एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥३॥
भावार्थ
मार्गमें चले जाते हुए मुनिने ताड़काको दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजीने एक ही बाणसे उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद ( अपना दिव्यस्वरूप ) दिया॥३॥
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥ जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥४॥
भावार्थ
तब ऋषि विश्वामित्रने प्रभुको मनमें विद्याका भण्डार समझते हुए भी [ लीलाको पूर्ण करनेके लिये ] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीरमें अतुलित बल और तेजका प्रकाश हो॥४॥
आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥२०९॥
भावार्थ
सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्रीरामजीको अपने आश्रममें ले आये; और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फलका भोजन कराया॥२०९॥
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