दोहा 208b
विश्वामित्र-यज्ञकी रक्षा
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥ चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥१॥
भावार्थ
इस अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। [ उन्होंने कहा— ] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही॥१॥
मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥ देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउंँ निमिष एक माहीं॥२॥
भावार्थ
हे मुनि! आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना माँग लीजिये, मैं आज बड़े हर्षके साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राणसे अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पलमें दे दूँगा॥२॥
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥ कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥३॥
भावार्थ
सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो [ किसी प्रकार भी ] देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके ( बिलकुल सुकुमार ) मेरे सुन्दर पुत्र!॥३॥
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥४॥
भावार्थ
प्रेम-रसमें सनी हुई राजाकी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजीने हृदयमें बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजीने राजाको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे राजाका सन्देह नाशको प्राप्त हुआ॥४॥
अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥ मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥५॥
भावार्थ
राजाने बड़े ही आदरसे दोनों पुत्रोंको बुलाया और हृदयसे लगाकर बहुत प्रकारसे उन्हें शिक्षा दी। [ फिर कहा— ] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! [ अब ] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं॥५॥
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस। जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस॥२०८ (क)॥
भावार्थ
राजाने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद देकर पुत्रोंको ऋषिके हवाले कर दिया। फिर प्रभु माताके महलमें गये और उनके चरणोंमें सिर नवाकर चले॥२०८ ( क )॥
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन। कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥२०८ (ख)॥
भावार्थ
पुरुषोंमें सिंहरूप दोनों भाई ( राम-लक्ष्मण ) मुनिका भय हरनेके लिये प्रसन्न होकर चले। वे कृपाके समुद्र, धीरबुद्धि और सम्पूर्ण विश्वके कारणके भी कारण हैं॥२०८ ( ख )॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें