दोहा 204
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥ जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥१॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी बहुत ही सरल ( भोली ) और सुन्दर ( मनभावनी ) बाललीलाओंका सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदोंने गान किया है। जिनका मन इन लीलाओंमें अनुरक्त नहीं हुआ, विधाताने उन मनुष्योंको वञ्चित कर दिया ( नितान्त भाग्यहीन बनाया )॥१॥
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥२॥
भावार्थ
ज्यों ही सब भाई कुमारावस्थाके हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माताने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्रीरघुनाथजी [ भाइयोंसहित ] गुरुके घरमें विद्या पढ़ने गये और थोड़े ही समयमें उनको सब विद्याएँ आ गयीं॥२॥
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥ बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृप लीला॥३॥
भावार्थ
चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान् पढ़ें, यह बड़ा कौतुक ( अचरज ) है।चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शीलमें [ बड़े ] निपुण हैं और सब राजाओंकी लीलाओंके ही खेल खेलते हैं॥३॥
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥ जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥४॥
भावार्थ
हाथोंमें बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर ( जड-चेतन ) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियोंमें खेलते [ हुए निकलते ] हैं, उन गलियोंके सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेहसे शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं॥४॥
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल। प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥२०४॥
भावार्थ
कोसलपुरके रहनेवाले स्त्री, पुरुष, बूढ़े और बालक सभीको कृपालु श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय लगते हैं॥२०४॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें