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दोहा 203

चौ०

बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥ कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥१॥

भावार्थ

भगवान्‌ने बहुत प्रकारसे बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकोंको अत्यन्त आनन्द दिया। कुछ समय बीतनेपर चारों भाई बड़े होकर कुटुम्बियोंको सुख देनेवाले हुए॥१॥

चौ०

चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥ परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥२॥

भावार्थ

तब गुरुजीने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया। ब्राह्मणोंने फिर बहुत-सी दक्षिणा पायी। चारों सुन्दर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं॥२॥

चौ०

मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥ भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥३॥

भावार्थ

जो मन, वचन और कर्मसे अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजीके आँगनमें विचर रहे हैं। भोजन करनेके समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बालसखाओंके समाजको छोड़कर नहीं आते॥३॥

चौ०

कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥ निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥४॥

भावार्थ

कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं। जिनका वेद ‘नेति’ ( इतना ही नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजीने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़नेके लिये दौड़ती हैं॥४॥

चौ०

धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥५॥

भावार्थ

वे शरीरमें धूल लपेटे हुए आये और राजाने हँसकर उन्हें गोदमें बैठा लिया॥५॥

दो०

भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥२०३॥

भावार्थ

भोजन करते हैं पर चित्त चञ्चल है। अवसर पाकर मुँहमें दही-भात लपटाये किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले॥२०३॥

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