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दोहा 126

चौ०

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥ कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥१॥

भावार्थ

जब कामदेव उस आश्रममें गया, तब उसने अपनी मायासे वहाँ वसन्त-ऋतुको उत्पन्न किया। तरह-तरहके वृक्षोंपर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उनपर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे॥ १ ॥

चौ०

चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥ रंभादिक सुरनारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥२॥

भावार्थ

कामाग्निको भड़कानेवाली तीन प्रकारकी ( शीतल, मन्द और सुगन्ध ) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवाङ्गनाएँ, जो सब-की-सब कामकलामें निपुण थीं,॥ २ ॥

चौ०

करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥ देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥३॥

भावार्थ

वे बहुत प्रकारकी तानोंकी तरङ्गके साथ गाने लगीं और हाथमें गेंद लेकर नाना प्रकारके खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने नाना प्रकारके मायाजाल किये॥ ३ ॥

चौ०

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥ सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥४॥

भावार्थ

परन्तु कामदेवकी कोई भी कला मुनिपर असर न कर सकी। तब तो पापी कामदेव अपने ही [ नाशके ] भयसे डर गया। लक्ष्मीपति भगवान्‌ जिसके बड़े रक्षक हों, भला, उसकी सीमा ( मर्यादा ) को कोई दबा सकता है?॥ ४ ॥

दो०

सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥१२६॥

भावार्थ

तब अपने सहायकोंसमेत कामदेवने बहुत डरकर और अपने मनमें हार मानकर बहुत ही आर्त ( दीन ) वचन कहते हुए मुनिके चरणोंको जा पकड़ा॥ १२६ ॥

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