दोहा 125
नारदका अभिमान और मायाका प्रभाव
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥ आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥१॥
भावार्थ
हिमालय पर्वतमें एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुन्दर गङ्गाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुन्दर आश्रम देखनेपर नारदजीके मनको बहुत ही सुहावना लगा॥ १ ॥
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥ सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥२॥
भावार्थ
पर्वत, नदी और वनके [ सुन्दर ] विभागोंको देखकर नारदजीका लक्ष्मीकान्त भगवान्के चरणोंमें प्रेम हो गया। भगवान्का स्मरण करते ही उन ( नारद मुनि ) के शापकी ( जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापतिने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थानपर नहीं ठहर सकते थे ) गति रुक गयी और मनके स्वाभाविक ही निर्मल होनेसे उनकी समाधि लग गयी॥ २ ॥
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥ सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥३॥
भावार्थ
नारद मुनिकी [ यह तपोमयी ] स्थिति देखकर देवराज इन्द्र डर गया। उसने कामदेवको बुलाकर उसका आदर-सत्कार किया [ और कहा कि ] मेरे [ हितके ] लिये तुम अपने सहायकोंसहित [ नारदकी समाधि भङ्ग करनेको ] जाओ। [ यह सुनकर ] मीनध्वज कामदेव मनमें प्रसन्न होकर चला॥ ३ ॥
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥ जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥ ४॥
भावार्थ
इन्द्रके मनमें यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी ( अमरावती ) का निवास ( राज्य ) चाहते हैं। जगत्में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौएकी तरह सबसे डरते हैं॥ ४ ॥
सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥१२५॥
भावार्थ
जैसे मूर्ख कुत्ता सिंहको देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं उस हड्डीको सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्रको [ नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते ] लाज नहीं आयी॥ १२५ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें