दोहा 117
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥ जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥१॥
भावार्थ
अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रमको तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्रीरामचन्द्रजीपर उसका आरोप करते हैं, जैसे आकाशमें बादलोंका पर्दा देखकर कुविचारी ( अज्ञानी ) लोग कहते हैं कि बादलोंने सूर्यको ढक लिया॥१॥
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥ उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥२॥
भावार्थ
जो मनुष्य आँखमें उँगली लगाकर देखता है, उसके लिये तो दो चन्द्रमा प्रकट ( प्रत्यक्ष ) हैं। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें इस प्रकार मोहकी कल्पना करना वैसा ही है जैसा आकाशमें अन्धकार, धूएँ और धूलका सोहना ( दीखना )। [ आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं ]॥२॥
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥ सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥३॥
भावार्थ
विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके देवता और जीवात्मा—ये सब एककी सहायतासे एक चेतन होते हैं। ( अर्थात् विषयोंका प्रकाश इन्द्रियोंसे, इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके देवताओंसे और इन्द्रियदेवताओंका चेतन जीवात्मासे प्रकाश होता है। ) इन सबका जो परम प्रकाशक है ( अर्थात् जिससे इन सबका प्रकाश होता है ), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं॥३॥
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥ जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥४॥
भावार्थ
यह जगत् प्रकाश्य है और श्रीरामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे मायाके स्वामी और ज्ञान तथा गुणोंके धाम हैं। जिनकी सत्तासे, मोहकी सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य-सी भासित होती है॥४॥
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥११७॥
भावार्थ
जैसे सीपमें चाँदीकी और सूर्यकी किरणोंमें पानीकी [ बिना हुए भी ] प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालोंमें झूठ है, तथापि इस भ्रमको कोई हटा नहीं सकता॥११७॥
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