दोहा 116
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥१॥
भावार्थ
सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है—मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप ( निराकार ), अलख ( अव्यक्त ) और अजन्मा है, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है॥१॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥ जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥२॥
भावार्थ
जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओलेमें भेद नहीं। ( दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं। ) जिसका नाम भ्रमरूपी अन्धकारके मिटानेके लिये सूर्य है, उसके लिये मोहका प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है?॥२॥
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥ सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥३॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोहरूपी रात्रिका लवलेश भी नहीं है। वे स्वभावसे ही प्रकाशरूप और [ षडैश्वर्ययुक्त ] भगवान् हैं, वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल भी नहीं होता। ( अज्ञानरूपी रात्रि हो तब तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल हो; भगवान् तो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। )॥३॥
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥ राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥४॥
भावार्थ
हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान—ये सब जीवके धर्म हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराणपुरुष हैं। इस बातको सारा जगत् जानता है॥४॥
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥११६॥
भावार्थ
जो [ पुराण ] पुरुष प्रसिद्ध हैं, प्रकाशके भण्डार हैं, सब रूपोंमें प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् सबके स्वामी हैं, वे ही रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं—ऐसा कहकर शिवजीने उनको मस्तक नवाया॥११६॥
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