दोहा 91
बिबिध बसन उपधान तुराईं। छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं॥ तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं॥१॥
भावार्थ
जहाँ [ ओढ़ने-बिछानेके ] अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूधके फेनके समान कोमल, निर्मल ( उज्ज्वल ) और सुन्दर हैं; वहाँ ( उन चौबारोंमें ) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रातको सोया करते थे और अपनी शोभासे रति और कामदेवके गर्वको हरण करते थे॥ १ ॥
ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए॥ मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी॥२॥
भावार्थ
वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं। ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी ( प्रजा ), मित्र, अच्छे शील-स्वभावके दास और दासियाँ— ॥ २ ॥
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाईं। महि सोवत तेइ राम गोसाईं॥ पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥३॥
भावार्थ
सब जिनकी अपने प्राणोंकी तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वीपर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत्में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्रके मित्र रघुराज दशरथजी हैं,॥ ३ ॥
रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥ सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥४॥
भावार्थ
और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीनपर सो रही हैं। विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी क्या वनके योग्य हैं ? लोग सच कहते हैं कि कर्म ( भाग्य ) ही प्रधान है॥ ४॥
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥९१॥
भावार्थ
कैकयराजकी लड़की नीचबुद्धि कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया॥ ९१ ॥
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