दोहा 88
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई॥ लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा॥१॥
भावार्थ
जब निषादराज गुहने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बन्धुओंको बुला लिया और भेंट देनेके लिये फल, मूल ( कन्द ) लेकर और उन्हें भारों ( बहँगियों )-में भरकर मिलनेके लिये चला। उसके हृदयमें हर्षका पार नहीं था॥१॥
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥ सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई॥२॥
भावार्थ
दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेमसे प्रभुको देखने लगा। श्रीरघुनाथजीने स्वाभाविक स्नेहके वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी॥२॥
नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें॥ देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा॥३॥
भावार्थ
निषादराजने उत्तर दिया—हे नाथ! आपके चरणकमलके दर्शनसे ही कुशल है [ आपके चरणारविन्दोंके दर्शनकर ] आज मैं भाग्यवान् पुरुषोंकी गिनतीमें आ गया। हे देव! यह पृथ्वी,धन और घर सब आपका है। मैं तो परिवारसहित आपका नीच सेवक हूँ॥३॥
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिअ जनु सबु लोगु सिहाऊ॥ कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना॥४॥
भावार्थ
अब कृपा करके पुर ( शृंगवेरपुर )-में पधारिये और इस दासकी प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्यकी बड़ाई करें। श्रीरामचन्द्रजीने कहा— हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है। परन्तु पिताजीने मुझको और ही आज्ञा दी है॥४॥
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥८८॥
भावार्थ
[ उनके आज्ञानुसार ] मुझे चौदह वर्षतक मुनियोंका व्रत और वेष धारण कर और मुनियोंके योग्य आहार करते हुए वनमें ही बसना है, गाँवके भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुहको बड़ा दुःख हुआ॥८८॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें