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दोहा 82

चौ०

जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥१॥

भावार्थ

यदि धैर्यवान्‌ दोनों भाई न लौटें—क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रणके सच्चे और दृढ़तासे नियमका पालन करनेवाले हैं—तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो! जनककुमारी सीताजीको तो लौटा दीजिये॥१॥

चौ०

जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥२॥

भावार्थ

जब सीता वनको देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुरने ऐसा सन्देश कहा है कि हे पुत्री! तुम लौट चलो, वनमें बहुत क्लेश हैं॥२॥

चौ०

पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥३॥

भावार्थ

कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत-से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणोंको सहारा हो जायगा॥३॥

चौ०

नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ॥४॥

भावार्थ

नहीं तो अन्तमें मेरा मरण ही होगा। विधाताके विपरीत होनेपर कुछ वश नहीं चलता। हा! राम, लक्ष्मण और सीताको लाकर दिखाओ। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥४॥

दो०

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ॥८२॥

भावार्थ

सुमन्त्रजी राजाकी आज्ञा पाकर, सिर नवाकर और बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहाँ गये जहाँ नगरके बाहर सीताजीसहित दोनों भाई थे॥८२॥

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