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दोहा 80

चौ०

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥१॥

भावार्थ

राजमहलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठजीके दरवाजेपर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरहकी अग्निमें जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने ब्राह्मणोंकी मण्डलीको बुलाया॥ १ ॥

चौ०

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥ जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥२॥

भावार्थ

गुरुजीसे कहकर उन सबको वर्षाशन ( वर्षभरका भोजन ) दिये और आदर, दान तथा विनयसे उन्हें वशमें कर लिया। फिर याचकोंको दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रोंको पवित्र प्रेमसे प्रसन्न किया॥ २ ॥

चौ०

दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥ सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाईं॥३॥

भावार्थ

फिर दास-दासियोंको बुलाकर उन्हें गुरुजीको सौंपकर, हाथ जोड़कर बोले—हे गुसाईं! इन सबकी माता-पिताके समान सार-सँभार ( देख-रेख ) करते रहियेगा॥ ३ ॥

चौ०

बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी॥४॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी बार-बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें॥ ४ ॥

दो०

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥८०॥

भावार्थ

हे परम चतुर पुरवासी सज्जनो! आपलोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरहके दुःखसे दुःखी न हों॥८०॥

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