दोहा 77
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥ नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥१॥
भावार्थ
राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त प्रेमसे चरणोंमें सिर नवाकर उठकर विदा माँगी—॥ १ ॥
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥ तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥२॥
भावार्थ
हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद ( कर्तव्यकर्ममें त्रुटि ) करनेसे जगत्में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी॥ २ ॥
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥ सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥३॥
भावार्थ
यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा— हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचरके स्वामी हैं॥ ३ ॥
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी॥ करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥४॥
भावार्थ
शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं॥ ४ ॥
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥७७॥
भावार्थ
[ किन्तु इस अवसरपर तो इसके विपरीत हो रहा है, ] अपराध तो कोई और ही करे और उसके फलका भोग कोई और ही पावे। भगवान्की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जाननेयोग्य जगत्में कौन है?॥७७॥
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