दोहा 56
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥ जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥१॥
भावार्थ
हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [ पितासे ] बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है॥१॥
पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥ अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥२॥
भावार्थ
वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलोंके सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [ सुकुमार ] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख होता है॥२॥
बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥ जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू॥३॥
भावार्थ
हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [ कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं]॥३॥
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥४॥
भावार्थ
हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही ( प्राणाधार ) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ!॥४॥
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥५६॥
भावार्थ
यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना॥५६॥
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