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दोहा 52

चौ०

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥ दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥१॥

भावार्थ

रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्योछावर किये॥१॥

चौ०

बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥ गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए॥२॥

भावार्थ

माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस ( दूध ) बहाने लगे॥२॥

चौ०

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥ सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥३॥

भावार्थ

उनका प्रेम और महान्‌ आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं—॥३॥

चौ०

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥ सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥४॥

भावार्थ

हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मङ्गलकारी लग्न कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है;॥४॥

दो०

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥५२॥

भावार्थ

तथा जिस ( लग्न ) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद्-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं॥५२॥

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