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दोहा 48

चौ०

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥१॥

भावार्थ

विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया,॥१॥

चौ०

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥ एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥२॥

भावार्थ

जो हठ करके ( कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर ) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक ( दूसरे ) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते॥२॥

चौ०

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥ एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥३॥

भावार्थ

वे शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं ( कुछ बोलते नहीं )॥३॥

चौ०

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥४॥

भावार्थ

कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायँगे। भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं॥४॥

दो०

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥४८॥

भावार्थ

चन्द्रमा चाहे [ शीतल किरणोंकी जगह ] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्नमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥४८॥

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