दोहा 46
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥ चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥१॥
भावार्थ
[ उन्होंने फिर कहा— ] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) उसके करतलगत ( मुट्ठीमें ) रहते हैं॥१॥
आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥२॥
भावार्थ
आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये। मातासे विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर ( प्रणाम करके ) वनको चलूँगा॥२॥
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥३॥
भावार्थ
ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये। राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी ( अप्रिय ) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो॥३॥
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥४
भावार्थ
इस बातको सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल ( वनमें आग लगी ) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने ( पीटने ) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता॥४॥
मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥४६॥
भावार्थ
सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हृदयमें नहीं समाता। मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उतर आयी हो॥४६॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें