दोहा 44
श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवधवासियोंका विषाद, कैकेयीको समझाना
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥ सचिव सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥१॥
भावार्थ
जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया। राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणोंमें पड़ते ( प्रणाम करते ) देखा॥१॥
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥२॥
भावार्थ
स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हृदयसे लगा लिया। मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली॥२॥
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहि बारा॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥३॥
भावार्थ
शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वनको न जायँ॥३॥
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥४॥
भावार्थ
फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं—हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष ( शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ) और अवढरदानी ( मुँहमाँगा दे डालनेवाले ) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये॥४॥
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥४४॥
भावार्थ
आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायँ॥४४॥
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