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दोहा 38

चौ०

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥ जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥१॥

भावार्थ

राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें॥१॥

चौ०

गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥२॥

भावार्थ

तब सुमन्त्र रावले ( राजमहल ) में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। [ ऐसा लगता है ] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो॥२॥

चौ०

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥३॥

भावार्थ

पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे। ‘जय-जीव’ कहकर सिर नवाकर ( वन्दना करके ) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये॥३॥

चौ०

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥४॥

भावार्थ

[ देखा कि— ] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है। जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर ( जड़से उखड़कर ) [ मुर्झाया ] पड़ा हो। मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली— ॥४॥

दो०

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु॥३८॥

भावार्थ

राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने ‘राम-राम’ रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते॥३८॥

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