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दोहा 316

चौ०

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥१॥

भावार्थ

राजधर्मका सर्वस्व ( सार ) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति॥१॥

चौ०

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥२॥

भावार्थ

इधर तो भरतजीका शील ( प्रेम ) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाजकी उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेहके विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजीके प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदिका संकोच भी होता है।) आखिर [ भरतजीके प्रेमवश ] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपाकर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजीने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया॥ २॥

चौ०

चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥ संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥३॥

भावार्थ

करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीके दोनों खड़ाऊँ प्रजाके प्राणोंकी रक्षाके लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजीके प्रेमरूपी रत्नके लिये मानो डिब्बा है और जीवके साधनके लिये मानो राम-नामके दो अक्षर हैं॥ ३ ॥

चौ०

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥४॥

भावार्थ

रघुकुल [ की रक्षा ] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल ( श्रेष्ठ ) कर्म करनेके लिये दो हाथकी भाँति ( सहायक ) हैं। और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्मके सुझानेके लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्बके मिल जानेसे परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजीके रहनेसे होता॥ ४॥

दो०

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ॥३१६॥

भावार्थ

भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया॥ ३१६ ॥

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