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दोहा 314

भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा

चौ०

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू॥१॥

भावार्थ

हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस ( आनन्द ) से युक्त हैं। आपके लिये भवदुःख ( जन्म-मरणके दुःख ) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु ( आप ) के बिना परमपद ( मोक्ष ) का लाभ भी व्यर्थ है॥१॥

चौ०

स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥२॥

भावार्थ

हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभीके हृदयकी और मुझ सेवकके मनकी रुचि, लालसा ( अभिलाषा ) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसीका पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफको ओर-अन्ततक निबाहेंगे॥२॥

चौ०

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो॥ आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू॥३॥

भावार्थ

मुझे सब प्रकारसे ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करनेपर तिनकेके बराबर ( जरा-सा ) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनोंने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है॥३॥

चौ०

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥ भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी॥४॥

भावार्थ

हे स्वामी! इस बड़े दोषको दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवकको शिक्षा दीजिये। दूध और जलको अलग-अलग करनेमें हंसिनीकी-सी गतिवाली भरतजीकी विनती सुनकर उसकी सभीने प्रशंसा की॥४॥

दो०

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन॥३१४॥

भावार्थ

दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजीके दीन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसरके अनुकूल वचन बोले— ॥३१४॥

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