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दोहा 299

चौ०

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥१॥

भावार्थ

हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगत्‌में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रोंने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी ( नास्तिक ) और निःशंक ( निडर ) हैं॥१॥

चौ०

तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने॥२॥

भावार्थ

उन्हें भी आपने शरणमें सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करनेपर ही अपना लिया। उन ( शरणागतों ) के दोषोंको देखकर भी आप कभी हृदयमें नहीं लाये और उनके गुणोंको सुनकर साधुओंके समाजमें उनका बखान किया॥२॥

चौ०

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥३॥

भावार्थ

ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे ( उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे ) और स्वप्नमें भी अपनी कोई करनी न समझकर ( अर्थात्‌ मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर ) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे!॥३॥

चौ०

सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥४॥

भावार्थ

मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर ( बड़े जोरके साथ ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। [ बंदर आदि ] पशु नाचते और तोते [ सीखे हुए ] पाठमें प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोतेका [ पाठप्रवीणतारूप ] गुण और पशुके नाचनेकी गति [ क्रमशः ] पढ़ानेवाले और नचानेवालेके अधीन है॥४॥

दो०

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर॥२९९॥

भावार्थ

इस प्रकार अपने सेवकोंकी ( बिगड़ी ) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया। कृपालु ( आप ) के सिवा अपनी विरदावलीका और कौन जबर्दस्ती ( हठपूर्वक ) पालन करेगा ?॥२९९॥

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