Ramayana.com

दोहा 286

चौ०

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही॥ तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी॥१॥

भावार्थ

जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियोंसे—जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजीको तपस्विनीके वेषमें देखकर सभी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १ ॥

चौ०

जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई॥ लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुनि पावन पेम प्रान की॥२॥

भावार्थ

जनकजी श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर डेरेको चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा। जनकजीने अपने पवित्र प्रेम और प्राणोंकी पाहुनी जानकीजीको हृदयसे लगा लिया॥ २ ॥

चौ०

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥३॥

भावार्थ

उनके हृदयमें [ वात्सल्य ] प्रेमका समुद्र उमड़ पड़ा। राजाका मन मानो प्रयाग हो गया। उस समुद्रके अंदर उन्होंने [ आदिशक्ति ] सीताजीके [ अलौकिक ] स्नेहरूपी अक्षयवटको बढ़ते हुए देखा। उस ( सीताजीके प्रेमरूपी वट ) पर श्रीरामजीका प्रेमरूपी बालक ( बालरूपधारी भगवान्‌ ) सुशोभित हो रहा है॥ ३ ॥

चौ०

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥ मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥४॥

भावार्थ

जनकजीका ज्ञानरूपी चिरंजीवी ( मार्कण्डेय ) मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया। वस्तुतः [ ज्ञानिशिरोमणि ] विदेहराजकी बुद्धि मोहमें मग्न नहीं है। यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है [ जिसने उन-जैसे महान्‌ ज्ञानीके ज्ञानको भी विकल कर दिया ]॥ ४ ॥

दो०

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥२८६॥

भावार्थ

पिता-माताके प्रेमके मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपनेको सँभाल न सकीं। [ परन्तु परम धैर्यवती ] पृथ्वीकी कन्या सीताजीने समय और सुन्दर धर्मका विचार कर धैर्य धारण किया॥ २८६ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें