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दोहा 281

चौ०

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥ सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥१॥

भावार्थ

इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [ सुननेवालोंके ] मनोंको हर लेते हैं। उसी समय सीताजीकी माता श्रीसुनयनाजीकी भेजी हुई दासियाँ [ कौसल्याजी आदिके मिलनेका ] सुन्दर अवसर देखकर आयीं॥ १ ॥

चौ०

सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू॥ कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी॥२॥

भावार्थ

उनसे यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ इस समय फुरसतमें हैं, जनकराजका रनिवास उनसे मिलने आया। कौसल्याजीने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये॥ २ ॥

चौ०

सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥ पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥३॥

भावार्थ

दोनों ओर सबके शील और प्रेमको देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं। शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रोंमें [ शोक और प्रेमके ] आँसू हैं। सब अपने [ पैरोंके ] नखोंसे जमीन कुरेदने और सोचने लगीं॥ ३ ॥

चौ०

सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥४॥

भावार्थ

सभी श्रीसीतारामजीके प्रेमकी मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष ( रूप ) धारण करके विसूर रही हो ( दुःख कर रही हो )। सीताजीकी माता सुनयनाजीने कहा—विधाताकी बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूधके फेन-जैसी कोमल वस्तुको वज्रकी टाँकीसे फोड़ रहा है ( अर्थात्‌ जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उनपर विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है )॥ ४ ॥

दो०

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥२८१॥

भावार्थ

अमृत केवल सुननेमें आता है और विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। विधाताकी सभी करतूतें भयङ्कर हैं। जहाँ-तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [ दिखायी देते ] हैं; हंस तो एक मानसरोवरमें ही है॥ २८१ ॥

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