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दोहा 273

जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप

चौ०

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥१॥

भावार्थ

कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि ( पश्चात्ताप ) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [ अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे ] चार ( कुछ ) दिन और रहना हो गया॥ १ ॥

चौ०

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥२॥

भावार्थ

इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रातःकाल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्‌की पूजा करते हैं॥ २ ॥

चौ०

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥ राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी॥३॥

भावार्थ

फिर लक्ष्मीपति भगवान्‌ विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर— ॥ ३ ॥

चौ०

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥४॥

भावार्थ

फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्‌में जीनेका लाभ दीजिये॥ ४ ॥

दो०

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ॥२७३॥

भावार्थ

गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते ही हमलोग अयोध्यामें मरें। सब कोई यही माँगते हैं॥ २७३ ॥

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