दोहा 267
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥ गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला॥१॥
भावार्थ
हे स्वामी! हे कृपाके समुद्र! हे अन्तर्यामी! अब मैं [ अधिक ] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराजको प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी॥ १ ॥
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें॥ मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥२॥
भावार्थ
मैं मिथ्या डरसे ही डर गया था। मेरे सोचकी जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और कालकी कठिनता, ॥ २ ॥
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला॥ यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥३॥
भावार्थ
इन सबने मिलकर पैर रोपकर ( प्रण करके ) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [ शरणागतकी रक्षाका ] प्रण निबाहा ( मुझे बचा लिया )। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है॥ ३ ॥
जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं॥ देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥४॥
भावार्थ
सारा जगत् बुरा [ करनेवाला ] हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले ( अनुकूल ) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाईसे भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख ( अनुकूल ) है, न विमुख ( प्रतिकूल )॥ ४ ॥
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥२६७॥
भावार्थ
उस वृक्ष ( कल्पवृक्ष ) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं॥ २६७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें