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दोहा 265

चौ०

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥१॥

भावार्थ

देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये॥ १ ॥

चौ०

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा॥२॥

भावार्थ

फिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [ घटना ] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये॥ २ ॥

चौ०

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा॥३॥

भावार्थ

पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्‌को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब ( इस बार ) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है॥ ३ ॥

चौ०

आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा॥ हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि॥४॥

भावार्थ

हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं ( अर्थात्‌ उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं )। अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने-अपने हृदयमें प्रेमसहित स्मरण करो॥ ४ ॥

दो०

सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥२६५॥

भावार्थ

देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्‌में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है॥ २६५ ॥

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