दोहा 263
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥ सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥१॥
भावार्थ
अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मग्न हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया। मानो कमलके वनपर पाला पड़ गया हो॥ १ ॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी॥ बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥२॥
भावार्थ
तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी ( ऐतिहासिक ) कथाएँ कहकर भरतजीका समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले— ॥ २ ॥
तात जायँ जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें॥३॥
भावार्थ
हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें [ भूत, भविष्य, वर्तमान ] तीनों कालों और [ स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल ] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं॥ ३ ॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥४॥
भावार्थ
हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक ( यहाँके सुख, यश आदि ) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है ( मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती )। माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है॥ ४ ॥
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥२६३॥
भावार्थ
हे भरत! तुम्हारा नाम-स्मरण करते ही सब पाप, प्रपञ्च ( अज्ञान ) और समस्त अमङ्गलोंके समूह मिट जायँगे तथा इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त होगा॥ २६३ ॥
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